भारत सरकार के कश्मीर मामलों पर विशेष प्रतिनिधि दिनेश्वर शर्मा देश के सबसे अहम पदों में से एक पर हैं

भारत सरकार के कश्मीर मामलों पर विशेष प्रतिनिधि दिनेश्वर शर्मा देश के सबसे अहम पदों में से एक पर हैं। गृहमंत्रालय ने उन्हें फ्री हैंड दिया है जबकि सरकार ने उन्हें कैबिनेट सेक्रेटरी के बराबर का दर्ज़ा दे रखा है। इसका मतलब ये हुआ कि वे सीधे प्रधानमंत्री या नैशनल सिक्योरिटी एडवाइजर को रिपोर्ट करते हैं।

गया के पास पाली गांव के मूल निवासी दिनेश्वर शर्मा के पिता और दादाजी दोनों पुलिस में थे। गया से ग्रैजुएशन करके यूपीएससी की परीक्षा पास की तो इंडियन फॉरेस्ट सर्विस मिली, लेकिन सर्विस में रहते हुए दोबारा परीक्षा दी और आईपीएस के लिए ज़रूरी रैंक ले आये। पुलिस सेवा में आने के बाद 1979 बैच के दिनेश्वर शर्मा को केरल कैडर मिला। गौरतलब है कि नैशनल सिक्योरिटी एडवाइजर अजित डोवाल भी इसी कैडर के 1968 बैच के अधिकारी हैं। केरल कैडर से वे अलग-अलग जगहों में डिप्यूटेशन पर भी गये। सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के डीआईजी रहे, इंटेलिजेंस ब्यूरो के ज्वाइंट डायरेक्टर (इस्लामिक आतंकवाद डेस्क) रहे और फिर सीआरपएफ के आईजी भी रहे। सीआरपीएफ आईजी रहते उनके पास जम्मू कश्मीर का चार्ज था। 90 का दशक जब कश्मीर के लिए सबसे कठिन दौर और उग्रवाद चरम पर पहुंच गया था तब दिनेश्वर शर्मा को 1992 में कश्मीर में पोस्टिंग मिली थी। राज्य के आईबी हेडक्वार्टर से वो पूरे जम्मू और कश्मीर पर नज़र रखते थे।

दिनेश्वर शर्मा और एनएसए अजीत डोवाल के बीच हमेशा अच्छे संबंध रहे हैं। केरल कैडर में साथ रहने के अलावा डोवाल जब आईबी के चीफ होते थे, तब भी दिनेश्वर शर्मा ने उनके साथ काम किया था। जब राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री होते थे, तब दिनेश्वर शर्मा उत्तर प्रदेश के सब्सीडियरी इंटेलिजेंस ब्यूरो (SIB) के चीफ होते थे। वे दिसंबर 2014 में आईबी के चीफ बनाये गये। उनके कार्यकाल के दौरान ही केरल, आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र में ISIS के मॉड्यूल का पता चला. अमूमन ऐसा खुलासा होने पर धड़ाधड़ गिरफ्तारियां होती हैं. लेकिन दिनेश्वर शर्मा ने तय किया कि इन मॉड्यूल से जुड़े लड़कों को गिरफ्तार करने की बजाय उनकी काउंसेलिंग करवायी। तब उनकी काफी प्रशंसा हुई थी।

दिनेश्वर शर्मा ने बतौर आईबी चीफ सबसे ज़्यादा दबाव झेला जुलाई 2016 में बुरहान वानी के मारे जाने के बाद। कश्मीर में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हो रहे थे और एजेंसियों को अलगाववादियों पर कार्रवाई करने के लिए सटीक इनपुट चाहिए थे, वो भी बहुत कम समय में। दिसंबर 2016 में वे रिटायर हो गये। सरकार उन्हें एक्सटेंशन देना चाहती थी, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। इसके बावजूद सरकार का भरोसा उनपर बना रहा और ये भरोसा कितना मज़बूत था, ये इस साल जून में देखने मिला। असम के उल्फा उग्रवादियों और बोडो समुदाय के नेताओं से बातचीत होनी थी तब इस बातचीत में भारत सरकार की तरफ से दिनेश्वर शर्मा शामिल हुए। सरकार केंद्रीय गृहमंत्रालय का ढांचा सुधारना चाहती है। इस कमिटी के चीफ भी दिनेश्वर शर्मा ही हैं।