आधुनिक भारतीय प्रिंट मीडिया के ट्रेंड सेटर हैं शशि शेखर (फेम इंडिया-एशिया पोस्ट मीडिया सर्वे 2017)

दैनिक हिन्दुस्तान के ग्रुप एडीटर शशि शेखर की भारतीय मीडिया में एक विशिष्ट पहचान है। साधारण कद-काठी और वेश-भूसा के शशि शेखर असाधारण तौर पर साहसी और अपने कर्तव्यों के प्रति ईमानदार हैं। उन्हें भीड़ में चलने वाला नहीं, बल्कि नयी राह बनाने वाले के तौर पर जाना जाता है। उनके दूरदर्शी फैसलों और साहसिक कोशिशों का ही नतीजा है कि हिन्दुस्तान देश के सबसे प्रतिष्ठित और विश्वसनीय अखबारों में शुमार है।

30 जून 1960 को उत्तर प्रदेश के मैनपुरी के चंदीकारा गांव में जन्मे शशि शेखर की प्रारंभिक शिक्षा मैनपुरी और आगरा में हुई है। आगरा से ग्रैजुएशन और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से प्राचीन इतिहास में एम.ए किया। उन्होंने प्रिंट मीडिया में दिग्गजों की परंपरा को तोड़ते हुए 1984 में महज़ 24 वर्ष की आयु में प्रतिष्ठित हिन्दी दैनिक ‘आज’ के स्थानीय संपादक की कुर्सी संभाली थी। वे आज के इलाहाबाद और आगरा संस्करण के संपादक रहे।

वर्ष 2001 में वे बतौर एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर ‘आजतक’ से जुड़े, लेकिन करीब डेढ़ साल बाद जुलाई 2002 में दोबारा प्रिंट में आ गये। इस बार उन्होंने ‘अमर उजाला’ मेरठ में कार्यकारी संपादक का कार्य संभाला। अमर उजाला को नये रंग-ढंग में ढालने और प्रोफेशनल रूप देने में शशि शेखर की भूमिका खासी महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। उन्होंने मेरठ में कार्यकारी संपादक के तौर पर ज्वाइन किया और जल्दी ही अपनी कार्यकुशलता के दम पर ग्रुप एडीटर व प्रेसीडेंट (न्यूज़) का पद हासिल कर लिया। शशि शेखर ने क्षेत्रीय अखबारों की ताकत को पहचाना और उसे मीडिया मे तेजी से हो रहे बदलावों से जोड़ा। नतीजा यह निकला कि छोटे-छोटे कस्बों के ब्यूरो में बैठा स्ट्रिंगर भी उस वक्त समाचार में इस्तेमाल हो रहे नये ट्रेंड से परिचित हो गये। उनकी विशेषज्ञता खबरों को अलग अंदाज में पेश करने की रही है।

सितंबर 2009 से वे ‘दैनिक हिंदुस्तान’, ‘नंदन’ और ‘कादंबिनी’ के मुख्य संपादक के पद पर कार्यरत हैं। हिन्दुस्तान अखबार समूह से जुड़ते ही शशि शेखर ने उसकी काया-पलट करवा दी। उन्होंने न सिर्फ पूरे दफ्तर को आधुनिकतम कंप्युटरों व उपकरणों से लैस करवाया बल्कि अखबार को भी विश्व प्रसिद्ध डिजाइनर मारियो से डिजाइन करवा कर खबरों के नये फ्लेवर के साथ पेश किया। पाठकों में बढ़िया रिस्पॉन्स दिखा और इसकी लोकप्रियता आसमान छूने लगी। उन्होंने युवा वर्ग को भी हिन्दी समाचार पत्र से जोड़ने का ऐसा कारनामा कर दिखाया जो प्रिंट मीडिया में लगभग असंभव माना जाता था।

उन्होंने पाठकों को सिटिजन जर्नलिस्ट बनाने का अनोखा प्रयोग किया और दूर-दराज के लोगों को खबरों के माध्यम से जोड़ा जिसकी काफी प्रशंसा हुई। ये कदम ट्रेंड सेटर बन गये जिन्हें लगभग हर अखबार ने फॉलो करना शुरू कर दिया। हिन्दी समाचार पत्रों के पुराने ढर्रे को तोड़ते हुए उन्होंने लीड में अपराध की खबरों की बजाय नौ मुख्य मुद्दों पर फोकस किया, जिनमें कारोबार, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, टेलीकम्युनिकेशन, कृषि व सूचना का अधिकार प्रमुख रहे। उनके इस प्रयोग को भी पाठकों का जोरदार समर्थन मिला।

उन्होंने चार किताबें लिखी हैं व कई टीवी कार्यक्रमों में होस्ट भी रहे हैं। भारतीय प्रिंट मीडिया में टीवी चैनलों की तरह इनपुट और आउटपुट का कॉन्सेप्ट उन्होंने ही लागू किया जिसके कारण अखबारों के दुनिया में क्रांति आ गयी। उन्हें ‘आज’, ‘अमर उजाला’ और ‘हिन्दुस्तान’ में सबसे अधिक संस्करण लांच करने वाले संपादक के तौर पर जाना जाता है। उनके दो कैंपेन ‘आओ राजनीति करें’ और ‘राजनीति खत्म, काम शुरु’ ने लोकप्रियता की नयी ऊंचाइयां छुईं। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड के विधानसभा चुनावों में तो डेढ़ करोड़ मतदाताओं ने अपना रजिस्ट्रेशन करवाया जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है।

सरल स्वभाव के शशि शेखर की मीडिया हो या राजनीति या फिर अफसरशाही, हर वर्ग में एक खास पहचान है, लेकिन उन्होंने कभी संबंधों को पत्रकारिता पर हावी होने नहीं दिया। उनका मानना है कि मीडिया की विश्वसनीयता तभी स्थापित हो सकती है जब वह निष्पक्ष और निर्भीक हो। उन्हें उत्तर प्रदेश रत्न और माधव ज्योति अलंकरण जैसे अवार्डों से भी सम्मानित होने का अवसर मिल चुका है। फेम इंडिया-एशिया पोस्ट मीडिया सर्वे 2017 में शशि शेखर को प्रिंट मीडिया के एक प्रमुख सरताज के तौर पर पाया गया है।